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इस तरह जानिए शुभ मुहूर्त क्या है...By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसी भी कार्य का प्रारंभ करने के लिए शुभ लग्न और मुहूर्त को देखा जाता है। जानिए वह कौन-सा वार, तिथि, माह, वर्ष लग्न, मुहूर्त आदि शुभ है जिसमें मंगल कार्यों की शुरुआत की जाती है।'श्रेष्ठ दिन'दिन और रात में दिन श्रेष्ठ है। वैदिक नियम अनुसार हर तरह का मंगल कार्य दिन में ही किया जाना चाहिए। अंतिम संस्कार और उसके बाद के क्रियाकर्म भी दिन में ही किए जाते हैं। 'श्रेष्ठ मुहूर्त'दिन-रात के 30 मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त ही श्रेष्ठ होता है। पुराने समय में जब बिजली नहीं होती थी तो लोग जल्दी सो जाते थे और ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कार्य करने लगते थे। जबसे बिजली का अविष्कार हुआ तब से व्यक्ति की दिनचर्या ही बदल गई। ब्रह्म मुहूर्त में उठने के कई लाभ शास्त्रों में बताए गए हैं। 'मुहूर्तों के नाम'एक मुहूर्त 2 घड़ी अर्थात 48 मिनट के बराबर होता है। 24 घंटे में 1440 मिनट होते हैं। मुहूर्त सुबह 6 बजे से शुरू होता है:- रुद्र, आहि, मित्र, पितॄ, वसु, वाराह, विश्वेदेवा, विधि, सतमुखी, पुरुहूत, वाहिनी, नक्तनकरा, वरुण, अर्यमा, भग,गिरीश, अजपाद, अहिर, बुध्न्य, पुष्य, अश्विनी, यम, अग्नि, विधातॄ, क्ण्ड, अदिति जीव/अमृत, विष्णु, युमिगद्युति, ब्रह्म और समुद्रम। 'श्रेष्ठ वार'सात वारों में रवि, मंगल और गुरु श्रेष्ठ है। इनमें भी गुरुवार को सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि गुरु की दिशा ईशान है और ईशान में ही देवताओं का वास होता है।वीडियो जरूर देखें... 'श्रेष्ठ चौघड़िया'दिन और राज के मिलाकर 7 चौघडि़या होते हैं जो वार अनुसार दिन और रात में बदलते रहते हैं। ये चौघड़िया है- शुभ, लाभ, अमृत, चर, काल, रोग, उद्वेग। शुभ, अमृत और लाभ चौघड़िया को ही श्रेष्ठ माना गया है उसमें भी शुभ चौघड़िया सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसका स्वामी गुरु है। अमृत का चंद्रमा और लाभ का बुध है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। समयानुसार चौघड़िया को तीन भागों में बांटा जाता है शुभ, मध्यम और अशुभ चौघड़िया। शुभ चौघडिया: शुभ (स्वामी गुरु), अमृत (स्वामी चंद्रमा), लाभ (स्वामी बुध)मध्यम चौघडिया: चर (स्वामी शुक्र)अशुभ चौघड़िया: उद्बेग (स्वामी सूर्य), काल (स्वामी शनि), रोग (स्वामी मंगल) 'श्रेष्ठ पक्ष'महीने में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। कृष्ण और शुक्ल पक्षों के दो मास में शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ है। चंद्र के बढ़ने को शुक्ल और घटने को कृष्ण पक्ष कहते हैं। शुक्ल की पूर्णिमा और कृष्ण की अमावस्या होती है। दोनों पक्षों में शुक्ल पक्ष को ही शुभ कार्यों के श्रेष्ठ माना जाता है। 'श्रेष्ठ एकादशी'प्रत्येक पक्ष में एक एकादशी होती है इस मान में माह में दो एकादशी। प्रत्येक वर्ष 24 और अधिकमास हो तो 26 एकादशियां होती हैं। प्रत्येक एकादशी का अपना अलग ही लाभ और महत्व है। उनमें भी कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी श्रेष्ठ है। प्रदोष को भी श्रेष्ठ माना गया है। 'श्रेष्ठ माह'मासों में चैत्र, वैशाख, कार्तिक, ज्येष्ठ, श्रावण, अश्विनी, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन श्रेष्ठ माने गए हैं उनमें भी चैत्र और कार्तिक सर्वश्रेष्ठ है। हिन्दू मास के नाम:- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। 'श्रेष्ठ पंचमी'प्रत्येक माह में पंचमी आती है। उसमें माघ मास के शुक्ल पक्ष की बसंत पंचमी श्रेष्ठ है। सावन माह की नाग पंचमी भी श्रेष्ठ है। 'श्रेष्ठ अयन'छह माह का दक्षिणायन और छह का उत्तरायण होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण मिलाकर एक वर्ष माना गया है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो देव सो जाते हैं और उत्तरायण होता है तो देव उठ जाते हैं। अत: उत्तरायण श्रेष्ठ है। 'श्रेष्ठ संक्रांति'सूर्य की 12 संक्रांतियों में मकर संक्रांति ही श्रेष्ठ है। सूर्यदेव जब धनु राशि से मकर पर पहुंचते हैं तोमकर संक्रांति मनाई जाती है। इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। 12 संक्रांतियों में से चार- मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं। 'श्रेष्ठ ऋ‍तु'छह ऋतुओं में वसंत और शरद ऋतु ही श्रेष्ठ है। 1. बसंत ऋतु, 2.ग्रीष्म ऋतु, 3.वर्षा ऋतु, 4.शरद ऋतु, 5.हेमन्त ऋतु, 6.शिशिर ऋतु। 'श्रेष्ठ नक्षत्र'नक्षत्र 27 होते हैं उनमें कार्तिक मास में पड़ने वाला पुष्य नक्षत्र श्रेष्ठ है। इसके अलावा अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रावण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती नक्षत्र शुभ माने गए हैं। शुभ मुहूर्त क्या है?मुहूर्त दो तरह के होते हैं शुभ मुहूर्त और अशुभ मुहूर्त। शुभ को ग्राह्य समय और अशुभ को अग्राह्‍य समय कहते हैं। शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्‍वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजित, रोहिण, बल, विजय, र्नेत, वरुण सौम्य और भग ये 15 मुहूर्त है। रवि के दिन 14वां, सोमवार के दिन 12वां, मंगलवार के दिन 10वां, बुधवार के दिन 8वां, गुरु के दिन 6टा, शुक्रवार के दिन 4था और शनिवार के दिन दूसरा मुहूर्त कुलिक शुभ कार्यों में वर्जित हैं।

इस तरह जानिए शुभ मुहूर्त क्या है...

'श्रेष्ठ दिन'
दिन और रात में दिन श्रेष्ठ है। वैदिक नियम अनुसार हर तरह का मंगल कार्य दिन में ही किया जाना चाहिए। अंतिम संस्कार और उसके बाद के क्रियाकर्म भी दिन में ही किए जाते हैं।
 
'श्रेष्ठ मुहूर्त'
दिन-रात के 30 मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त ही श्रेष्ठ होता है। पुराने समय में जब बिजली नहीं होती थी तो लोग जल्दी सो जाते थे और ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कार्य करने लगते थे। जबसे बिजली का अविष्कार हुआ तब से व्यक्ति की दिनचर्या ही बदल गई। ब्रह्म मुहूर्त में उठने के कई लाभ शास्त्रों में बताए गए हैं।
 'मुहूर्तों के नाम'
एक मुहूर्त 2 घड़ी अर्थात 48 मिनट के बराबर होता है। 24 घंटे में 1440 मिनट होते हैं। मुहूर्त सुबह 6 बजे से शुरू होता है:- रुद्र, आहि, मित्र, पितॄ, वसु, वाराह, विश्वेदेवा, विधि, सतमुखी, पुरुहूत, वाहिनी, नक्तनकरा, वरुण, अर्यमा, भग,गिरीश, अजपाद, अहिर, बुध्न्य, पुष्य, अश्विनी, यम, अग्नि, विधातॄ, क्ण्ड, अदिति जीव/अमृत, विष्णु, युमिगद्युति, ब्रह्म और समुद्रम।

 'श्रेष्ठ वार'
सात वारों में रवि, मंगल और गुरु श्रेष्ठ है। इनमें भी गुरुवार को सर्वश्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि गुरु की दिशा ईशान है और ईशान में ही देवताओं का वास होता है।


वीडियो जरूर देखें...
 
'श्रेष्ठ चौघड़िया'
दिन और राज के मिलाकर 7 चौघडि़या होते हैं जो वार अनुसार दिन और रात में बदलते रहते हैं। ये चौघड़िया है- शुभ, लाभ, अमृत, चर, काल, रोग, उद्वेग। शुभ, अमृत और लाभ चौघड़िया को ही श्रेष्ठ माना गया है उसमें भी शुभ चौघड़िया सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसका स्वामी गुरु है। अमृत का चंद्रमा और लाभ का बुध है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। समयानुसार चौघड़िया को तीन भागों में बांटा जाता है शुभ, मध्यम और अशुभ चौघड़िया।
 
शुभ चौघडिया: शुभ (स्वामी गुरु), अमृत (स्वामी चंद्रमा), लाभ (स्वामी बुध)
मध्यम चौघडिया: चर (स्वामी शुक्र)
अशुभ चौघड़िया: उद्बेग (स्वामी सूर्य), काल (स्वामी शनि), रोग (स्वामी मंगल)
 
'श्रेष्ठ पक्ष'
महीने में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। कृष्ण और शुक्ल पक्षों के दो मास में शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ है। चंद्र के बढ़ने को शुक्ल और घटने को कृष्ण पक्ष कहते हैं। शुक्ल की पूर्णिमा और कृष्ण की अमावस्या होती है। दोनों पक्षों में शुक्ल पक्ष को ही शुभ कार्यों के श्रेष्ठ माना जाता है।
 
'श्रेष्ठ एकादशी'
प्रत्येक पक्ष में एक एकादशी होती है इस मान में माह में दो एकादशी। प्रत्येक वर्ष 24 और अधिकमास हो तो 26 एकादशियां होती हैं। प्रत्येक एकादशी का अपना अलग ही लाभ और महत्व है। उनमें भी कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी श्रेष्ठ है। प्रदोष को भी श्रेष्ठ माना गया है।
 
'श्रेष्ठ माह'
मासों में चैत्र, वैशाख, कार्तिक, ज्येष्ठ, श्रावण, अश्विनी, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन श्रेष्ठ माने गए हैं उनमें भी चैत्र और कार्तिक सर्वश्रेष्ठ है। हिन्दू मास के नाम:- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
 
'श्रेष्ठ पंचमी'
प्रत्येक माह में पंचमी आती है। उसमें माघ मास के शुक्ल पक्ष की बसंत पंचमी श्रेष्ठ है। सावन माह की नाग पंचमी भी श्रेष्ठ है।
 
'श्रेष्ठ अयन'
छह माह का दक्षिणायन और छह का उत्तरायण होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण मिलाकर एक वर्ष माना गया है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो देव सो जाते हैं और  उत्तरायण होता है तो देव उठ जाते हैं। अत: उत्तरायण श्रेष्ठ है।
 
'श्रेष्ठ संक्रांति'
सूर्य की 12 संक्रांतियों में मकर संक्रांति ही श्रेष्ठ है। सूर्यदेव जब धनु राशि से मकर पर पहुंचते हैं तो
मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। 12 संक्रांतियों में से चार- मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं।
 
'श्रेष्ठ ऋ‍तु'
छह ऋतुओं में वसंत और शरद ऋतु ही श्रेष्ठ है। 1. बसंत ऋतु, 2.ग्रीष्म ऋतु, 3.वर्षा ऋतु, 4.शरद ऋतु, 5.हेमन्त ऋतु, 6.शिशिर ऋतु।
 
'श्रेष्ठ नक्षत्र'
नक्षत्र 27 होते हैं उनमें कार्तिक मास में पड़ने वाला पुष्य नक्षत्र श्रेष्ठ है। इसके अलावा अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रावण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती नक्षत्र शुभ माने गए हैं।
 
शुभ मुहूर्त क्या है?
मुहूर्त दो तरह के होते हैं शुभ मुहूर्त और अशुभ मुहूर्त। शुभ को ग्राह्य समय और अशुभ को अग्राह्‍य समय कहते हैं। शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्‍वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजित, रोहिण, बल, विजय, र्नेत, वरुण सौम्य और भग ये 15 मुहूर्त है।
 
रवि के दिन 14वां, सोमवार के दिन 12वां, मंगलवार के दिन 10वां, बुधवार के दिन 8वां, गुरु के दिन 6टा, शुक्रवार के दिन 4था और शनिवार के दिन दूसरा मुहूर्त कुलिक शुभ कार्यों में वर्जित हैं।

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वास्तु मेन गेट डिजाइन फोटो 2022 Main Gate Design Images(लोहा गेट)By वनिता कासनियां पंजाब ?hi Hindiइस पोस्ट में मैं आपको घर के मुख्य या मेन गेट डिजाईन फोटो के बारें में बताने वाला हूँ. एक बार घर कंस्ट्रक्शन का मुख्य काम होने के बाद आपको क्रिएटिव तरीके से सोचने की जरुरत होती हैं. घर के लिए पेंट, गेट की डिजाईन को इस कद्र चुनना चाहिए कि वह घर की सुन्दरता और शोभा को बढ़ा सके. दूसरा कारन यह भी हैं कि यह आपके सपनों का एक हिस्सा होगा, इसलिए घर के मेन गेट की डिजाईन को बहुत अच्छी और मजबूत चुननी चाहिए.यहाँ मेन गेट डिजाइन फोटो 2022 सलेक्शन में लगभग 45 से अधिक अलग अलग सुन्दर डिजाईन का सिलेक्शन किया हैं. आप इन डिजाईन को देखकर अपने लिए कोई सुन्दर विचार निकाल सकते हैं.बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रमसुन्दर मेन गेट डिजाइन फोटो 2022अगर घर का कंस्ट्रक्शन काम पूरा हो गया हैं तो अब आपको इसकी सिक्यूरिटी और प्राइवेसी के बारें मे सोचना चाहिए. एक ऊँचा और मजबूत गेट घर को सिक्योर तो बनाता ही हैं, साथ में घर को सुन्दर भी बनाता हैं.2आजकल घर का मेन गेट कई डिजाईनों में बनने लग गया हैं. आप यहाँ दिखाई गयी अलग अलग डिजाईन में से कोई भी डिजाईन को चुन सकते हैं.3Main gate design photo 20224एंट्रेंस गेट कई प्रकार का होता हैं. एंट्रेंस या घर का मेन गेट का प्रकार स्विंग गेट होता हैं. स्विंग गेट अन्दर या बाहर की तरफ खुलते हैं. स्विंग गेट, सिंगल स्विंग गेट, डबल स्विंग गेट मोडल्स में आते हैं. आमतौर पर आवासीय गहरो में मेन गेट के रूप में स्विंग गेट का ऊपयोग किया जाता हैं. 5मुख्य गेट का एक प्रकार स्लाइडिंग गेट होता हैं. स्लाइडिंग गेट एक पटरी पर रेल की तरह चलते हैं, यह गेट सुरक्षा की दृष्टि से काफी अच्छे होते हैं. क्योंकि बाहर से लॉक तक आसानी से हाथ नहीं पहुँचता हैं. स्लाइडिंग गेट ड्राइव गेट के रूप में हाई सिक्यूरिटी प्रदान करते हैं.6घर के मेन गेट डिजाइन फोटो 20227हालांकि लोग घरों के बाहर लिफ्ट गेट नहीं बनाते हैं. वाहन और गाड़ियों को आवाजाही के लिए अनुमति देने के लिएय फाटक या गेट को ऊपर किया जाता हैं. लिफ्ट गेट तब चुना जाता हैं, जब घर के सामने जमीन बहुत कम होती हैं. मेन गेट डिजाइन फोटोघर का मुख्य प्रवेश द्वार खरीदने से पहले या मुख्य गेट बनाने से पहले यह सुनिश्चित जरूर कर ले कि आपने जो भी माप चुना हैं वह ठीक आयामों में मापा गया हो. 9Iron gate design photo 202210एक अच्छा गेट बनाने की चाहत रखते हैं तो आपको पहले खुद से पूछे की आप गेट से क्या उम्मीद रखते हैं, या आपकी घर के मुख्य गेट को लेकर क्या उमीदें हैं.11ऐसा हो सकता हैं कि जो गेट दिखने में सुन्दर होता हैं, वह उतना मजबूत भी हो, इसकी कोई गारंटी नहीं हैं. गेट स्टाइलिश होने के साथ साथ मजबूत भी होना चाहिए. इस बात का विशेष रूप से ख्याल रखे.12Loha gate photo for new house13गेट के लिए सही सामग्री चुने, गेट के लिए लोहा चुन सकते हैं. लोहा के अलावा आप लकड़ी भी चुन सकते हैं, लकड़ी के अलावा मार्बल भी चुना जा सकता हैं. सभी कीमत लग अलग होती हैं. लोहा का गेट सबसे सस्ता पड़ सकता हैं. उत्तम दर्जे की लकड़ी काफी महँगी पड़ सकती हैं.14यदि आप अपने गेट में लिफ्ट लगाने चाहते हैं, तो इस बात का पूरा ध्यान रखे की लिफ्ट की ऊंचाई आपके वाहन की ऊंचाई से अधिक हो.15लोहा गेट डिजाइन फोटोलोहा का गेट जिस पर सिल्वर कलर की इंटर डिजाईन आप देख सकते हैं. इस डिजाईन से गेट का लुक बहुत ही अद्भुत लग रहा हैं. आप देख सकते हैं कि गेट का कलर बिलकुल घर के कलर से मिलता झूलता हैं.17स्टील लुक के कलर में आप इस सुन्दर घर के मुख्य गेट को देख सकते है.18घरों के लिए सामने गेट डिजाइन19मेन गेट डिजाइन फोटो को आप इन इमेज में देख सकते हैं.20मेन गेट डिजाइन फोटो को देखे.21Ghar ke main darvaje ki design photo22फेंसी और न्यू डिजाईन से मिक्स गेट को आप इस फोटो में देख सकते हैं.23सिंपल हैंडल ओपनिंग गेट डिजाईन आप देख सकते, यह डिजाईन आजकल खूब पसंद नहीं की जाती हैं.घर के मेन दरवाजे की डिजाइन25बहुत ही सुन्दर और आकर्षक गेट की डिजाईन को आप इस फोटो में देख सकते हैं. इस तरह की डिजाईन आजकल खूब पसंद की जाती हैं.27घर के बाहर के मेन गेट की डिजाइन28मजबूत और सुन्दर भाला रेलिंग के रूप में यह डिजाईन घर के मुख्य दरवाजे गेट के लिए पसंद की जा सकती हैं.29यह एक चादर गेट हैं, घर के लिए मुख्य दरवाजे के रूप में इसको पसंद किया जा सकता हैं.30चादर गेट डिजाइन31बीच में पतली चद्दर पट्टी का मुख्य गेट आपके दिल को खुश कर सकता हैं.चद्दर पाइपों से मिलकर बना यह गेट आपको खूब पसंद आ सकता हैं.33फैंसी लोहा गेट डिजाइन फोटो 34प्लेन सिंपल और हल्का आप इस मेन गेट को फोटो में दख सकते हैं.35बड़ा मेहराब आकर का यह गेट बहुत ही मजबूत होता हैं, इसका वजन लगभग 300 किलो तक होता हैं.36फैंसी गेट डिजाईन फोटो37लकड़ी लुक का सुन्दर मुख्य गेट आप इस फोटो में देख सकते हैं.38वाहन की एंट्री और घर के सदस्यों के लिए अलग अलग दो गेट बनाए जा सकते हैं. इसका फायदा यह हैं की बार बार बड़ा वाला गेट को खोलने की जरुरत नहीं होती हैं.नए जमाने के गेट डिजाईन39लकड़ी का बना हुआ यह गेट आपको खूब पसंद आएगा. अगर मुख्य दरवाजे पर लकड़ी का गेट बनाया जाता हैं, तो यह ध्यान रखना चाहिए कि लकड़ी वाटर प्रूफ हो.लोहे की चादर और सिंपल डिजाईन से बना गेट आप इस घर के मेन गेट पर देख सकते हैं.41नए घर के गेट42लोहे की सिंपल डिजाईन का गेट आप इस घर के मुख्य गेट में देख सकते हैं.43मकान के टावर की डिजाइन – Staircase Tower Design photo simple Homeदुनिया का सबसे ऊंचा बड़ा बिल्डिंग टावर इमारत (duniya ki sabse unchi building)43घर के लिए एंट्रेंस गेट डिजाईन फोटो44यहाँ बताये गए डिजाईन आपको अगर पसंद आये हो तो हमने मकान टावर और घर के समें की डिजाईन की फोटो डिजाईन भी अपलोड की हैं. आप उनको भी देख सकते हैं.45घर का बाहरी डिजाइन फोटो & गांव के घर का डिजाइन – Village House Designघ बनाने का तरीका – Ghar 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वास्तु शास्त्रBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबकिसी अन्य भाषा में पढ़ेंडाउनलोड करेंध्यान रखेंसंपादित करेंStub icon यह लेख एक आधार है। जानकारी जोड़कर इसे बढ़ाने में विकिपीडिया की मदद करें।संस्कृत में कहा गया है कि... गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना। [1]वास्तु शास्त्र घर, प्रासाद, भवन अथवा मन्दिर निर्माण करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है। जीवन में जिन वस्तुओं का हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होता है उन वस्तुओं को किस प्रकार से रखा जाए वह भी वास्तु है वस्तु शब्द से वास्तु का निर्माण हुआ हैवास्तु पुरुष की अवधारणाडिजाइन दिशात्मक संरेखण के आधार पर कर रहे हैं। यह हिंदू वास्तुकला में लागू किया जाता है, हिंदू मंदिरों के लिये और वाहनों सहित, बर्तन, फर्नीचर, मूर्तिकला, चित्रों, आदि।दक्षिण भारत में वास्तु का नींव परंपरागत महान साधु मायन को जिम्मेदार माना जाता है और उत्तर भारत में विश्वकर्मा को जिम्मेदार माना जाता है।वास्तुशास्त्र एवं दिशाएं संपादित करेंवास्तुशास्त्र एवं दिशाएंउत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है।वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा संपादित करेंवास्तुशास्त्र में यह दिशा बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है क्योंकि यह सूर्य के उदय होने की दिशा है। इस दिशा के स्वामी देवता इन्द्र हैं। भवन बनाते समय इस दिशा को सबसे अधिक खुला रखना चाहिए। यह सुख और समृद्धि कारक होता है। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर भवन में रहने वाले लोग बीमार रहते हैं। परेशानी और चिन्ता बनी रहती हैं। उन्नति के मार्ग में भी बाधा आति है।वास्तुशास्त्र में आग्नेय दिशासंपादित करेंपूर्व और दक्षिण के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। अग्निदेव इस दिशा के स्वामी हैं। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर का वातावरण अशांत और तनावपूर्ण रहता है। धन की हानि होती है। मानसिक परेशानी और चिन्ता बनी रहती है। यह दिशा शुभ होने पर भवन में रहने वाले उर्जावान और स्वास्थ रहते हैं। इस दिशा में रसोईघर का निर्माण वास्तु की दृष्टि से श्रेष्ठ होता है। अग्नि से सम्बन्धित सभी कार्य के लिए यह दिशा शुभ होता है।वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशासंपादित करेंइस दिशा के स्वामी यम देव हैं। यह दिशा वास्तुशास्त्र में सुख और समृद्धि का प्रतीक होता है। इस दिशा को खाली नहीं रखना चाहिए। दक्षिण दिशा में वास्तु दोष होने पर मान सम्मान में कमी एवं रोजी रोजगार में परेशानी का सामना करना होता है। गृहस्वामी के निवास के लिए यह दिशा सर्वाधिक उपयुक्त होता है।वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशासंपादित करेंदक्षिण और पश्चिम के मध्य की दिशा को नैऋत्य दिशा कहते हैं। इस दिशा का वास्तुदोष दुर्घटना, रोग एवं मानसिक अशांति देता है। यह आचरण एवं व्यवहार को भी दूषित करता है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को भारी रखना चाहिए। इस दिशा का स्वामी राक्षस है। यह दिशा वास्तु दोष से मुक्त होने पर भवन में रहने वाला व्यक्ति सेहतमंद रहता है एवं उसके मान सम्मान में भी वृद्धि होती है।वास्तुशास्त्र में ईशान दिशासंपादित करेंईशान दिशा के स्वामी शिव होते हैं, इस दिशा में कभी भी शोचालय नहीं बनाना चाहिये!नलकुप, कुंआ आदि इस दिशा में बनाने से जल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है।सन्दर्भसंपादित करें↑ "वास्तुशास्त्र विभाग, संस्कृत विद्यापीठ , नई दिल्ली". मूल से 12 अगस्त 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 अगस्त 2017.इन्हें भी देखेंसंपादित करेंवास्तुकला (आर्किटेक्चर)BAL Vnita mahila ashramशिल्पशास्त्रभारतीय स्थापत्यकलाबाहरी कड़ियाँसंपादित करेंस्थापत्य वेद - यहाँ सभी प्रमुख स्थापत्य वेद देवनागरी में उपलब्ध हैं।वास्तुविद्या के अनुसार भवन में कक्षों में का उपयुक्त स्थान (अखण्ड ज्योति १९९९)रूपमण्डनम् (वास्तुशास्त्र का संस्कृत ग्रंथ) (गूगल पुस्तक ; व्याख्याता - बलराम श्रीवास्तव)क्या है वास्तु ? (पंजाबकेसरी)आपके घर की वास्‍तु विशेषताएंआपके सपनों के घर में वास्तु की भूमिकाVnita Kasnia घर के लिए वास्तुवास्तु अनुसार टॉयलेट टिप्स और उपायLast edited 10 days ago By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबRELATED PAGESपूर्ववास्तुकलावास्तुकलाहिन्दू मन्दिर वास्तुकलाधार्मिक स्थलसामग्री CC BY-SA 3.0 By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबके अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो।गोपनीयता नीति उपयोग की शर्तेंडेस्कटॉप

वास्तु शास्त्र By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें यह लेख एक  आधार  है। जानकारी जोड़कर इसे  बढ़ाने में  विकिपीडिया की मदद करें। संस्कृत  में कहा गया है कि...  गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना।   [1] वास्तु शास्त्र  घर, प्रासाद,  भवन  अथवा  मन्दिर  निर्माण करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है। जीवन में जिन वस्तुओं का हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होता है उन वस्तुओं को किस प्रकार से रखा जाए वह भी वास्तु है वस्तु शब्द से वास्तु का निर्माण हुआ है वास्तु पुरुष की अवधारणा डिजाइन दिशात्मक संरेखण के आधार पर कर रहे हैं। यह हिंदू वास्तुकला में लागू किया जाता है, हिंदू मंदिरों के लिये और वाहनों सहित, बर्तन, फर्नीचर, मूर्तिकला, चित्रों, आदि। दक्षिण भारत में वास्तु का नींव परंपरागत महान साधु  मायन  को जिम्मेदार माना जाता है और उत्तर भारत में  विश्वकर्मा  को जिम्मेदार माना जाता है। वा...

हठयोगBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबकिसी अन्य भाषा में पढ़ेंडाउनलोड करेंध्यान रखेंसंपादित करेंहठयोग चित्तवृत्तियों के प्रवाह को संसार की ओर जाने से रोककर अंतर्मुखी करने की एक प्राचीन भारतीय साधना पद्धति है, जिसमें प्रसुप्त कुंडलिनी को जाग्रत कर नाड़ी मार्ग से ऊपर उठाने का प्रयास किया जाता है और विभिन्न चक्रों में स्थिर करते हुए उसे शीर्षस्थ सहस्रार चक्र तक ले जाया जाता है। हठयोग प्रदीपिका इसका प्रमुख ग्रंथ है।षट्कर्म, आसन (जैसे मयूरासन), मुद्रा (जैसे विपरीत करणी), प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम आदि) हठयोग के प्रमुख अंग हैं।हठयोग, योग के कई प्रकारों में से एक है। योग के अन्य प्रकार ये हैं- मंत्रयोग, लययोग, राजयोग। हठयोग के आविर्भाव के बाद प्राचीन 'अष्टांग योग' को 'राजयोग' की संज्ञा दे दी गई।हठयोग साधना की मुख्य धारा शैव रही है। यह सिद्धों और बाद में नाथों द्वारा अपनाया गया। मत्स्येन्द्र नाथ तथा गोरख नाथ उसके प्रमुख आचार्य माने गए हैं। गोरखनाथ के अनुयायी प्रमुख रूप से हठयोग की साधना करते थे। उन्हें नाथ योगी भी कहा जाता है। शैव धारा के अतिरिक्त बौद्धों ने भी हठयोग की पद्धति अपनायी थी। इस योग का महत्व वर्तमान काल मे उतना ही है जितना पहले था ।परिचय संपादित करेंहठयोग के बारे में लोगों की धारणा है कि हठ शब्द के हठ् + अच् प्रत्यय के साथ 'प्रचण्डता' या 'बल' अर्थ में प्रयुक्त होता है। हठेन या हठात् क्रिया-विशेषण के रूप में प्रयुक्त करने पर इसका अर्थ बलपूर्वक या प्रचंडता पूर्वक, अचानक या दुराग्रहपूर्वक अर्थ में लिया जाता है। 'हठ विद्या' स्त्रीलिंग अर्थ में 'बलपूर्वक मनन करने' के विज्ञान के अर्थ में ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सामान्यतः लोग हठयोग को एक ऐसे योग के रूप में जानते हैं जिसमें हठ पूर्वक कुछ शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएं की जातीं हैं। इसी कारण सामान्य शरीर शोधन की प्रक्रियाओं से हटकर की जाने वाली शरीर शोधन की षट् क्रियाओं (नेति, धौति, कुंजल वस्ति, नौलि, त्राटक, कपालभाति) को हठयोग मान लिया जाता है। जबकि ऐसा नहीं है। षटकर्म तो केवल शरीर शोधन के साधन है वास्तव में हठयोग तो शरीर एवं मन के संतुलन द्वारा राजयोग प्राप्त करने का पूर्व सोपान के रूप में विस्तृत योग विज्ञान की चार शाखाओं में से एक शाखा है।साधना के क्षेत्र में हठयोग शब्द का यह अर्थ बीज वर्ण ह और ठ को मिलाकर बनाया हुआ शब्द के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। जिसमें ह या हं तथा ठ या ठं (ज्ञ) के अनेको अर्थ किये जाते हैं। उदाहराणार्थ ह से पिंगला नाड़ी दहिनी नासिका (सूर्य स्वर) तथा ठ से इड़ा नाडी बॉंयी नासिका (चन्द्रस्वर)। इड़ा ऋणात्मक (-) उर्जा शक्ति एवं पिगंला धनात्मक (+) उर्जा शक्ति का संतुलन एवं इत्यादि इत्यादि। इन दोनों नासिकाओं के योग या समानता से चलने वाले स्वर या मध्यस्वर या सुषुम्ना नाड़ी में चल रहे प्राण के अर्थ में लिया जाता है। इस प्रकार ह और ठ का योग प्राणों के आयाम से अर्थ रखता है। इस प्रकार की प्राणायाम प्रक्रिया ही ह और ठ का योग अर्थात हठयोग है, जो कि सम्पूर्ण शरीर की जड़ता को सप्रयास दूर करता है प्राण की अधिकता नाड़ी चक्रों को सबल एवं चैतन्य युक्त बनाती है ओर व्यक्ति विभिन्न शारीरिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों का विकास करता है।स्थूल रूप से हठ योग अथवा प्राणायाम क्रिया तीन भागों में पूरी की जाती है -(1) रेचक - अर्थात श्वास को सप्रयास बाहर छोड़ना।(2) पूरक - अर्थात श्वास को सप्रयास अन्दर खींचना।(3) कुम्भक - अर्थात श्वास को सप्रयास रोके रखना। कुम्भक दो प्रकार से संभव है -(क) बर्हिःकुम्भक - अर्थात श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना।(ख) अन्तःकुम्भक - अर्थात श्वास को अन्दर खींचकर श्वास को अन्दर ही रोके रखना।इस प्रकार सप्रयास प्राणों को अपने नियंत्रण से गति देना हठयोग है। यह हठयोग राजयोग की सिद्धि के लिए आधारभूमि बनाता है। बिना हठयोग की साधना के राजयोग (समाधि) की प्राप्ति बड़ा कठिन कार्य है। अतः हठयोग की साधना सिद्ध होने पर राजयोग की ओर आगे बढ़ने में सहजता होती है।संपादित करें

हठयोग By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब किसी अन्य भाषा में पढ़ें डाउनलोड करें ध्यान रखें संपादित करें हठयोग  चित्तवृत्तियों के प्रवाह को संसार की ओर जाने से रोककर अंतर्मुखी करने की एक प्राचीन भारतीय साधना पद्धति है, जिसमें प्रसुप्त  कुंडलिनी  को जाग्रत कर नाड़ी मार्ग से ऊपर उठाने का प्रयास किया जाता है और विभिन्न चक्रों में स्थिर करते हुए उसे शीर्षस्थ  सहस्रार चक्र  तक ले जाया जाता है।  हठयोग प्रदीपिका  इसका प्रमुख ग्रंथ है। षट्कर्म ,  आसन  (जैसे  मयूरासन ),  मुद्रा  (जैसे  विपरीत करणी ),  प्राणायाम  (जैसे  अनुलोम-विलोम  आदि) हठयोग के प्रमुख अंग हैं। हठयोग,  योग  के कई प्रकारों में से एक है। योग के अन्य प्रकार ये हैं- मंत्रयोग, लययोग, राजयोग। हठयोग के आविर्भाव के बाद प्राचीन ' अष्टांग योग ' को ' राजयोग ' की संज्ञा दे दी गई। हठयोग साधना की मुख्य धारा  शैव  रही है। यह  सिद्धों  और बाद में  नाथों  द्वारा अपनाया गया।  मत्स्येन्द्र नाथ  तथा  गोरख नाथ ...