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वैशाख के महीने में श्री श्री तुलसी जल दान का महत्वBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦 वैशाख के महीने में क्योंकि सूर्य के ताप में वृद्धि हो जाती है, इसलिए विष्णु के भक्त गणों को जल दान करने से श्रीहरि अत्यंत अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भगवान श्री हरि कृपा करके उनसे अभिन्न तुलसी वृक्ष को जल दान का एक सुयोग अथवा शुभ अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन तुलसी को जल दान क्यों करना चाहिए ?तुलसी श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं, उनकी कृपा के फल से ही हम भगवान श्री कृष्ण के सेवा का अवसर प्राप्त कर सकते हैं। तुलसी देवी के संबंध में कहा गया है तुलसी के दर्शन मात्र से ही संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं , जल दान करने से यम भय दूर हो जाता है, रोपण करने से यानी उनको बोने से उनकी कृपा से कृष्ण भक्ति वृद्धि होती है और श्रीहरि के चरण में तुलसी अर्पण करने से कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है ।पद्मपुराण के सृष्टि खंड में वैष्णव श्रेष्ठ श्री महादेव अपने पुत्र कार्तिक को कहते है" सर्वेभ्य पत्र पुस्पेभ्य सत्यमा तुलसी शीवा सर्व काम प्रदत्सुतधा वैष्णवी विष्णु सुख प्रिया "समस्त पत्र और पुष्प में तुलसी सर्वश्रेष्ठ हैं। तुलसी सर्व कामना प्रदान करने वाली, मंगलमय, श्रुधा, शुख्या, वैष्णवी, विष्णु प्रेयसी एवं सभी लोको में परम शुभाय है। भगवान शिव कहते हैं ,"यो मंजरी दलरे तुलस्या विष्णु मर्त्ये तस्या पुण्य फलम कर्तितुम नैव शक्तते तत्र केशव सानिध्य यात्रस्ती तुलसी वनम तत्रा ब्रह्म च कमला सर्व देवगने "हे कार्तिक! जो व्यक्ति भक्ति भाव से प्रतिदिन तुलसी मंजरी अर्पण कर भगवान श्रीहरि की आराधना करता है , यहां तक कि मैं भी उसके पुण्य का वर्णन करने में अक्षम हूं। जहां भी तुलसी का वन होता है भगवान श्री गोविंद वही वास करते हैं और भगवान गोविंद की सेवा के लिए लक्ष्मी ब्रह्मा और सारे देवता वही वास करते हैं। मूलतः भगवान श्री कृष्ण ने जगत में बध जीव गणों को उनकी सेवा करने का शुभ अवसर प्रदान करने के लिए , भगवान श्री कृष्ण ही तुलसी रूप में आविर्भूत हुए है, एवं उन्होंने तुलसी पौधे को सर्वाधिक प्रिय रूप में स्वीकार किया है । पताल खंड में यमराज ब्राह्मण को तुलसी की महिमा का वर्णन करते हैंवैशाख में तुलसी पत्र द्वारा श्री हरि की सेवा के प्रसंग में वह कहते हैं कि जो व्यक्ति संपूर्ण वैशाख मास में अनन्य भक्ति भाव से तुलसी द्वारा त्री संध्या भगवान श्रीकृष्ण की अर्चना करता है उस व्यक्ति का और पुनर्जन्म नहीं होता । तुलसी देवी की अनंत महिमा अनंत शास्त्रों में अनंत शास्त्रों में वर्णित है लेकिन यह महिमा असीमित है अनंत है ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्रकृति खंड में ऐसा वर्णन है "शिरोधार्य च सर्वे सामीप सताम विश्व पावनी जीवन मुक्ता मुक्तिदायिनी चा भजेताम हरि भक्ति दान " जो सबके शिरोधार्य है, उपासया हैं, जीवन मुक्ता है, मुक्ति दायिनी है और श्री हरि की भक्ति प्रदान करने वाली हैं । वह समस्त विश्व को पवित्र करने वाली हैं , ऐसी समस्त विश्व को पवित्र करने वाली विश्व पावनी तुलसी देवी को मैं सादर प्रणाम करता हूं । समग्र वैदिक शास्त्रों के संकलन करने वाले तथा संपादक श्री व्यास देव तुलसी की महिमा करते हुए पद्मपुराण के सृष्टि खंड में कहते"पूजन किर्तने ध्याने परोपने धारने कलो तुलसी ध्यते पापं स्वर्ग मोक्ष दादातीउपदेशम दृश्य दृष्या स्यम आचरते पुनःस याति परम अनुस्थनाम माधवसे के कनम" तुलसी देवी की पूजा, कीर्तन , ध्यान, रोपण और धारण पाप को नाश करने वाला होता है और इससे परम गति प्राप्त होती है । जो व्यक्ति किसी अन्य को तुलसी द्वारा भगवान श्री हरि की अर्चना करने का उपदेश देता है और स्वयं भी अर्चना करता है वही वह श्री माधव के धाम में गमन करता है । केवल तुलसी देवी के नाम उच्चारण मात्र से ही श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं और इसके परिणाम स्वरूप पाप समूह नष्ट हो जाता है और अक्षय पुण्य प्राप्त होता है । पदम् पुराण के ब्रह्म खंड में कहां गया है "गंगाताम सरिता श्रेष्ठ: विष्णु ब्रह्मा महेश्वरा:देव: तीर्थ पुष्करा तेश्थ्यम तुलसी दले"गंगा आदि समस्त पवित्र नदी एवं ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुष्कर आदि समस्त तीर्थ सर्वथा तुलसी दल में विराजमान रहते हैं । ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि समस्त पृथ्वी में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैवह तुलसी उद्विग्न के मूल में तीर्थ निवास करते हैं । तुलसी देवी की कृपा से भक्तवृंद कृष्ण भक्ति प्राप्त करते हैं और वृंदावन वास की योग्यता अर्जित करते हैं । वृंदा देवी तुलसी देवी समस्त विश्व को पावन करने में सक्षम है और सब के द्वारा ही पूज्य है । समस्त पुष्पों के मध्य वो सर्वश्रेष्ठ हैं और श्री हरि सारे देवता ब्राह्मण और वैष्णव गन का आनंद का वर्धन करने वाली हैं । वे अतुलनीय और कृष्ण की जीवन स्वरूपनी है । जो नित्य तुलसी सेवा करते हैं वह समस्त क्लेश से मुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करते हैं । अतः श्रीहरि की अत्यंत प्रिय तुलसी को जल दान अवश्य करना चाहिए । इसके अलावा इस समय भगवान से अभिन्न प्रकाश श्री शालिग्राम शिला को भी जल दान की व्यवस्था की जाती है ।शास्त्रों में तुलसी देवी को जल दान करने पर तुलसी के मूल में जो जल बच जाता है उसका भी विशेष महत्व वर्णित किया गया है । इस विषय में एक कहानी बताई गई है- एक समय एक वैष्णव तुलसी देवी को जल प्रदान कर और परिक्रमा करके घर वापस जा रहे थे कि कुछ समय पश्चात एक भूखा कुत्ता वहां आकर तुलसी देवी के मूल में पड़े हुए जल था उसको पीने लगा लेकिन तभी वहां एक बाघ आया और उसको कहने लगा दुस्त कुकुर तुम क्यों मेरे घर में खाना चोरी करने आए हो और चोरी भी करना ठीक है लेकिन मिट्टी का बर्तन क्यों तोड़ कर आए हो तुम्हारे लिए उचित दंड केवल मृत्युदंड है । इसके उपरांत बाग उस कुत्ते को वही मार देता है और तभी यमदूत के गण उस कुत्ते को लेने आते हैं। लेकिन उसी समय विष्णु दूतगण वहां आते है और उनके रोकते है और कहते है यह कुत्ता पूर्व जन्म में जघन्य पाप करने के कारण नाना प्रकार के दंड पाने के योग्य हो गया था लेकिन केवल तुलसी के पौधे के मूल में पड़े जल का पान करने के फल से उसका समस्त पाप नष्ट हो चुका है और तो और वह विष्णु गमन करने की योग्यता अर्जित कर चुका है । अतः वह कुत्ता सुंदर रूप को प्राप्त करता है और वैकुंठ के दूत गणों के साथ भगवद धाम गमन करता है ।जगत जीवो को कृपा करने के उद्देश्य से ही भगवान के अंतरंग शक्ति श्रीमती राधारानी का प्रकाश वृंदा तुलसी देवी के रूप में इस जगत में प्रकट हुआ है । उसी प्रकार भगवान श्री हरि भी बध जीवो को माया के बंधन से मुक्त करने के लिए विचित्र लीला के माध्यम से अपने अभिन्न स्वरुप शालिग्राम शिला रूप में प्रकाशित हुए हैं । चारों वेदों के अध्ययन से लोगों को जो फल प्राप्त होता है केवल शालिग्राम शिला के अर्चना करने मात्र से ही वह पूर्ण फल प्राप्त किया जाना संभव है । जो शालिग्राम शिला के स्नान जल , चरणामृत आदि को नित्य पान करते हैं वह महा पवित्र होते हैं एवं जीवन के अंत में भगवद धाम गमन करते हैं ।

वैशाख के महीने में श्री श्री तुलसी जल दान का महत्व
By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦
 
वैशाख के महीने में क्योंकि सूर्य के ताप में वृद्धि हो जाती है, इसलिए विष्णु के भक्त गणों को जल दान करने से श्रीहरि अत्यंत अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भगवान श्री हरि कृपा करके उनसे अभिन्न तुलसी वृक्ष को जल दान का एक सुयोग अथवा शुभ अवसर प्रदान करते हैं।

 लेकिन तुलसी को जल दान क्यों करना चाहिए ?

तुलसी श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं, उनकी कृपा के फल से ही हम भगवान श्री कृष्ण के सेवा का अवसर प्राप्त कर सकते हैं। तुलसी देवी के संबंध में कहा गया है तुलसी के दर्शन मात्र से ही संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं , जल दान करने से यम भय दूर हो जाता है, रोपण करने से यानी उनको बोने से उनकी कृपा से कृष्ण भक्ति वृद्धि होती है और श्रीहरि के चरण में तुलसी अर्पण करने से कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है ।

पद्मपुराण के सृष्टि खंड में वैष्णव श्रेष्ठ श्री महादेव अपने पुत्र कार्तिक को कहते है

" सर्वेभ्य पत्र पुस्पेभ्य सत्यमा तुलसी शीवा सर्व काम प्रदत्सुतधा वैष्णवी विष्णु सुख प्रिया "

समस्त पत्र और पुष्प में तुलसी सर्वश्रेष्ठ हैं। तुलसी सर्व कामना प्रदान करने वाली, मंगलमय, श्रुधा, शुख्या, वैष्णवी, विष्णु प्रेयसी एवं सभी लोको में परम शुभाय है।

 भगवान शिव कहते हैं ,

"यो मंजरी दलरे तुलस्या विष्णु मर्त्ये तस्या पुण्य फलम कर्तितुम नैव शक्तते 
तत्र केशव सानिध्य यात्रस्ती तुलसी वनम तत्रा ब्रह्म च कमला सर्व देवगने "

हे कार्तिक! जो व्यक्ति भक्ति भाव से प्रतिदिन तुलसी मंजरी अर्पण कर भगवान श्रीहरि की आराधना करता है , यहां तक कि मैं भी उसके पुण्य का वर्णन करने में अक्षम हूं। जहां भी तुलसी का वन होता है भगवान श्री गोविंद वही वास करते हैं और भगवान गोविंद की सेवा के लिए लक्ष्मी ब्रह्मा और सारे देवता वही वास करते हैं।

 मूलतः भगवान श्री कृष्ण ने जगत में बध जीव गणों को उनकी सेवा करने का शुभ अवसर प्रदान करने के लिए , भगवान श्री कृष्ण ही तुलसी रूप में आविर्भूत हुए है, एवं उन्होंने तुलसी पौधे को सर्वाधिक प्रिय रूप में स्वीकार किया है । पताल खंड में यमराज ब्राह्मण को तुलसी की महिमा का वर्णन करते हैं
वैशाख में तुलसी पत्र द्वारा श्री हरि की सेवा के प्रसंग में वह कहते हैं कि जो व्यक्ति संपूर्ण वैशाख मास में अनन्य भक्ति भाव से तुलसी द्वारा त्री संध्या भगवान श्रीकृष्ण की अर्चना करता है उस व्यक्ति का और पुनर्जन्म नहीं होता । 

 तुलसी देवी की अनंत महिमा अनंत शास्त्रों में अनंत शास्त्रों में वर्णित है लेकिन यह महिमा असीमित है अनंत है

 ब्रह्मवैवर्त पुराण में प्रकृति खंड में ऐसा वर्णन है

 "शिरोधार्य च सर्वे सामीप सताम विश्व पावनी जीवन मुक्ता मुक्तिदायिनी चा भजेताम हरि भक्ति दान " 

जो सबके शिरोधार्य है, उपासया हैं, जीवन मुक्ता है, मुक्ति दायिनी है और श्री हरि की भक्ति प्रदान करने वाली हैं । वह समस्त विश्व को पवित्र करने वाली हैं , ऐसी समस्त विश्व को पवित्र करने वाली विश्व पावनी तुलसी देवी को मैं सादर प्रणाम करता हूं ।

 समग्र वैदिक शास्त्रों के संकलन करने वाले तथा संपादक श्री व्यास देव तुलसी की महिमा करते हुए पद्मपुराण के सृष्टि खंड में कहते

"पूजन किर्तने ध्याने परोपने धारने कलो तुलसी ध्यते पापं स्वर्ग मोक्ष दादाती
उपदेशम दृश्य दृष्या स्यम आचरते पुनः
स याति परम अनुस्थनाम माधवसे के कनम" 

तुलसी देवी की पूजा, कीर्तन , ध्यान, रोपण और धारण पाप को नाश करने वाला होता है और इससे परम गति प्राप्त होती है ।

 जो व्यक्ति किसी अन्य को तुलसी द्वारा भगवान श्री हरि की अर्चना करने का उपदेश देता है और स्वयं भी अर्चना करता है वही वह श्री माधव के धाम में गमन करता है । केवल तुलसी देवी के नाम उच्चारण मात्र से ही श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं और इसके परिणाम स्वरूप पाप समूह नष्ट हो जाता है और अक्षय पुण्य प्राप्त होता है । 

पदम् पुराण के ब्रह्म खंड में कहां गया है
 "गंगाताम सरिता श्रेष्ठ: विष्णु ब्रह्मा महेश्वरा:
देव: तीर्थ पुष्करा तेश्थ्यम तुलसी दले"

गंगा आदि समस्त पवित्र नदी एवं ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुष्कर आदि समस्त तीर्थ सर्वथा तुलसी दल में विराजमान रहते हैं ।

 ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि समस्त पृथ्वी में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ है
वह तुलसी उद्विग्न के मूल में तीर्थ निवास करते हैं । तुलसी देवी की कृपा से भक्तवृंद कृष्ण भक्ति प्राप्त करते हैं और वृंदावन वास की योग्यता अर्जित करते हैं । वृंदा देवी तुलसी देवी समस्त विश्व को पावन करने में सक्षम है और सब के द्वारा ही पूज्य है । 

समस्त पुष्पों के मध्य वो सर्वश्रेष्ठ हैं और श्री हरि सारे देवता ब्राह्मण और वैष्णव गन का आनंद का वर्धन करने वाली हैं । वे अतुलनीय और कृष्ण की जीवन स्वरूपनी है । जो नित्य तुलसी सेवा करते हैं वह समस्त क्लेश से मुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करते हैं । अतः श्रीहरि की अत्यंत प्रिय तुलसी को जल दान अवश्य करना चाहिए ।

 इसके अलावा इस समय भगवान से अभिन्न प्रकाश श्री शालिग्राम शिला को भी जल दान की व्यवस्था की जाती है ।

शास्त्रों में तुलसी देवी को जल दान करने पर तुलसी के मूल में जो जल बच जाता है उसका भी विशेष महत्व वर्णित किया गया है । इस विषय में एक कहानी बताई गई है-  
एक समय एक वैष्णव तुलसी देवी को जल प्रदान कर और परिक्रमा करके घर वापस जा रहे थे कि कुछ समय पश्चात एक भूखा कुत्ता वहां आकर तुलसी देवी के मूल में पड़े हुए जल था उसको पीने लगा लेकिन तभी वहां एक बाघ आया और उसको कहने लगा दुस्त कुकुर तुम क्यों मेरे घर में खाना चोरी करने आए हो और चोरी भी करना ठीक है लेकिन मिट्टी का बर्तन क्यों तोड़ कर आए हो तुम्हारे लिए उचित दंड केवल मृत्युदंड है । इसके उपरांत बाग उस कुत्ते को वही मार देता है और तभी यमदूत के गण उस कुत्ते को लेने आते हैं। लेकिन उसी समय विष्णु दूतगण वहां आते है और उनके रोकते है और कहते है यह कुत्ता पूर्व जन्म में जघन्य पाप करने के कारण नाना प्रकार के दंड पाने के योग्य हो गया था लेकिन केवल तुलसी के पौधे के मूल में पड़े जल का पान करने के फल से उसका समस्त पाप नष्ट हो चुका है और तो और वह विष्णु गमन करने की योग्यता अर्जित कर चुका है । अतः वह कुत्ता सुंदर रूप को प्राप्त करता है और वैकुंठ के दूत गणों के साथ भगवद धाम गमन करता है ।

जगत जीवो को कृपा करने के उद्देश्य से ही भगवान के अंतरंग शक्ति श्रीमती राधारानी का प्रकाश वृंदा तुलसी देवी के रूप में इस जगत में प्रकट हुआ है । उसी प्रकार भगवान श्री हरि भी बध जीवो को माया के बंधन से मुक्त करने के लिए विचित्र लीला के माध्यम से अपने अभिन्न स्वरुप शालिग्राम शिला रूप में प्रकाशित हुए हैं । चारों वेदों के अध्ययन से लोगों को जो फल प्राप्त होता है केवल शालिग्राम शिला के अर्चना करने मात्र से ही वह पूर्ण फल प्राप्त किया जाना संभव है । जो शालिग्राम शिला के स्नान जल , चरणामृत आदि को नित्य पान करते हैं वह महा पवित्र होते हैं एवं जीवन के अंत में भगवद धाम गमन करते हैं ।

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Vastu Tips: घर के इन स्थानों पर भूल से भी न बनवाएं कुआं, होगी हानि ही हानि By वनिता कासनियां पंजाब शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथवास्तु शास्त्री बताते हैं कि घर में गहरी खुदाई के लिए पूर्व दिशा का चयन करना शुभकारी होता है। अक्सर देखा जाता है कि लोग घर में पानी की आवश्यकता के लिए बोरपांप अथवा कुएं की खुदाई करवाते हैं। मगर इस दौरान दिशाओं का ध्यान रखना अधिक आवश्यक होता है। अन्यथा वहां रह रहे लोगों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।दरअसल वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य नौ प्रमुख स्थानों के बारे में बताया है। जिनमें आठ दिशाएं तथा एक ब्रह्म स्थान शामिल है। कहा जाता है इन समस्त स्थानों में से ब्रह्म स्थान पर अत्थाधिक ऊंचाई होना अथवा कुआं व बोर खोदा जाना हानिकारक साबित होता है। इस लिए इस स्थान पर ऐसा कोई भी कार्य करने से बचना चाहिए।इसके अलावा वास्तु शास्त्री बताते हैं कि वायव्य कोण जिसे उत्तर-पश्चिम कहा जाता है, कोने में बोर व कुएं का निर्माण करवाने से दैहिक-दैविक तथा भौतिक कष्ट होने की आशंका बढ़ जाती है। इतना ही नहीं घर के सदस्यों को मानिसक परेशानियां होने लगती है। क्योंकि यह चंद्रमा की दिशा मानी जाती है, इसलिए यहां दोष पैदा होने से मनोभाव प्रभावित होता है।नैऋ़त्य कोण यानि दक्षिण-पश्चिम में बोर, कुआं होने से घर स्वामी के नाश का संकेत होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह दिशा राहू की होती है, इस दिशा में अधिक खुदाई करने से आकस्मिक घटनाक्रम बढ़ जाते हैं। इसके साथ ही इस दिशा में बोर व कुआं होने से स्त्री को कष्ट होता है, घर की मालकिन का प्रभाव कमजोर होता है।इसके अतिरिक्त दक्षिण-पूर्व में उक्त व्यवस्था होने से घर के बच्चों को कष्ट की आशंका रहती है। उनकी शिक्षा दीक्षा तथा लालन-पालन में कमी रह जाती है।वास्तु के अनुसार कुआं और वाटर बोर उत्तर-पूर्व एवं उत्तर दिशा में होना शुभ होता है। उत्तर दिशा बुध ग्रह की होती है, जिसे हल्की दिशा माना जाता है।कहा जाता है इस दिशा में जल का प्रवाह सकारात्मक रहता है ठीक उसी तरह उत्तर-पूर्व गुरु की दिशा होती है, जिसे ईशान कोण कहते हैं। इस दिशा को पूजा आदि की दिशा कहा जाता है। यह दिशा व स्थान में स्वच्छ जल का प्रवाह और संग्रह सुख सौख्य कारक मानी जाती है।,

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वास्तु के अनुसार, हमारे आसपास कई ऐसी चीजें मौजूद होती हैं, जिनके इस्तेमाल से न केवल घर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है बल्कि वे हमारे जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है. By #वनिता #कासनियां #पंजाब आज हम बात कर रहे हैं ईशान कोण की. ईशान कोण शुभ दिशा में से एक है. उत्तर और #पूर्व के बीच की दिशा को ईशान कोण कहा जाता है. ऐसे में इस दिशा के महत्व के बारे में पता होना जरूरी है. आज का हमारा लेख इसी विषय पर है. आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि ईशान कोण की #दिशा का क्या महत्व है और यह कैसे हमारे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है. पढ़ते हैं आगे...ईशान कोण का महत्वईशान कोण को देवताओं की दिशा माना जाता है. कहते हैं शिव जी का एक नाम ईशान भी है. इस दिशा में सभी देवी देवताओं का वास रहता है.ईशान कोण में धरती थोड़ी उठी हुई और झुकी हुई होती है इसके अलावा इस कोण में धरती का आकाश ज्यादा खुला और बड़ा नजर आता है.ईशान कोण में ग्रह बृहस्पति और देवता ब्रह्मा का भी वास है. ऐसे में इस दिशा में जल का घड़ा भर कर रखा जा सकता है.वास्तु के अनुसार ईशान कोण में ही पूजा घर भी बनवाना चाहिए. हालांकि किसी लाल किताब की जानकारी से जानकारी लेकर ही ऐसा करें.ईशान कोण को धन, स्वास्थ्य, ऐश्वर्या, वंश और मान-सम्मान का कोण माना जाता है. इस दिशा को बेहद ही स्वच्छ और पवित्र दिशा माना जाता है.#मुख्य #द्वार यदि ईशान कोण में हो तो ऐसा बेहद ही शुभ माना जाता है. ऐसे में लोग अपना घर का मुख्य द्वार #ईशान मुखी बनवाते हैं. हालांकि शौचालय, किचन और शयन कक्ष के लिए भी वास्तु की राय लेनी जरूरी है.जरूरी उपायईशान कोण में #तुलसी का #पौधा लगाने से जीवन में कोई संकट नहीं आता है.ईशान कोण में धन और आभूषण रखने से घर में रहने वाले लोग #बुद्धिमान बनते हैं.इस दिशा में मुख्य दरवाजा होने से लगातार वायु का प्रवाह बना रहता है.

वास्तु के अनुसार, हमारे आसपास कई ऐसी चीजें मौजूद होती हैं, जिनके इस्तेमाल से न केवल घर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है बल्कि वे हमारे जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है.By #वनिता #कासनियां #पंजाब आज हम बात कर रहे हैं ईशान कोण की. ईशान कोण शुभ दिशा में से एक है. उत्तर और #पूर्व के बीच की दिशा को ईशान कोण कहा जाता है. ऐसे में इस दिशा के महत्व के बारे में पता होना जरूरी है. आज का हमारा लेख इसी विषय पर है. आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि ईशान कोण की #दिशा का क्या महत्व है और यह कैसे हमारे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है. पढ़ते हैं आगे...ईशान कोण का महत्वईशान कोण को देवताओं की दिशा माना जाता है. कहते हैं शिव जी का एक नाम ईशान भी है. इस दिशा में सभी देवी देवताओं का वास रहता है.ईशान कोण में धरती थोड़ी उठी हुई और झुकी हुई होती है इसके अलावा इस कोण में धरती का आकाश ज्यादा खुला और बड़ा नजर आता है.ईशान कोण में ग्रह बृहस्पति और देवता ब्रह्मा का भी वास है. ऐसे में इस दिशा में जल का घड़ा भर कर रखा जा सकता है.वास्तु के अनुसार ईशान कोण में ही पूजा घर भी बनवाना चाहि...